Monday, 18 April 2016

मैं हर पल गुनगुनाउंगा

मैं हर पल गुनगुनाउंगा, क्या  गीत मेरा बन पायेगी ?
मैं कवि बन जाऊंगा , क्या तू रचना बन पायेगी ?
ध्रुव तारा बन जाऊंगा मैं काली स्याह रात में ,
वादा कर तू कही अंजान डगर में गुम  हो जाएगी
मैं निकल पडूंगा अनन्त पर पंछी बन के
क्या तू मेरा आसमान बन पायेगी ?
मैं तप लूंगा बाती बन , क्या दीया थाम पायेगी ?
मैं हँसी बन जाऊंगा , क्या अपने होठो पे खिलाएगी ?
मैं काँटा बन जाता हु,  फिर तू गुलाब बन जाएगी ?
रंग गुलाल बन लूंगा मैं , फिर अपने गालो पर सहलाएगी?
मैं काला कज्जल भी बन सकता हु , क्या नैनों में रमायेगी?
मैं छोड़ दूंगा निज जीवन  भी , क्या तू भी कदम मिलाएगी ?

Tuesday, 15 March 2016

हमारी मधुशाला


गर है होश ज़रा तो उठ खड़ा हो
और देख जहा नजरें जाती हो,
हर कोई बैठा है यहाँ पर
लिए हाथ में मे मद प्याला। 
भटको को ये राह दिखाती
राहगीरों को फिर भटकाती,
भला बुरा अब खुद ही समझ ले
ऐसी  है हमारी  "मधुशाला" 

Monday, 23 November 2015

सूनापन 

खुदा के बन्दे मर गए 
मर गया उनका खुदा 
तू अपनी ही जमात में
है खुद से ही जुदा

      

बिस्मिल को सन्देश

 झाँका जब इतिहास में अपने , एक बेईमानी सी हरकत थी,
देखा जब वर्तमान को मेरे , छल कपट से कहा फुरसत थी?
जितना भी परखा इस जीवन को , समझा में बिस्मिल ,
सरफ़रोशी की तमन्ना कब हमारे दिल में थी ??