Saturday, 6 August 2016


रुदन 

कल देखा एक हाड का पुतला
मांस ना उसमे छटाँक था ,
लोगो की खुसफुसाहट में सुना
उसका नाम किसान था।

जिस पर वो संभला गिरा चढ़ता था
बचपन जिसका जहाँ अटका था
उसी तालाब के  बरगद पे
आज कही वो लटका था।

बेवा उसकी रोती थी किधर
कोने में अपनी कुटिया के
बाबा कहना भी सीखा ना था
देखे आंसू उस बिटिया के।

लड़का उसका ना रोया था
धीरज हिव में संजोया था
दिन चढ़ता जाता जेठ का 
सूरज ने भी आपा खोया था

निर्धन लाचार अनपढ़ औरत
ऊपर से दलित भी होती है
जाकर देखो हर तीजे घर में
कोई ना कोई रोती है।

इन कर्ज़ों में दबी लाशों पे
नींवे हमारी लगती है
झोपड़िया ही सिमटती जाती है
भवनों में महफ़िल सजती है।

सुन रुदन आज उस औरत का
अस्तित्व मेरा न गमा जाऊँ
चीखों से सबकी आज यही
ये धरा फटे मैं समां जाऊ।  

Monday, 18 April 2016

मैं हर पल गुनगुनाउंगा

मैं हर पल गुनगुनाउंगा, क्या  गीत मेरा बन पायेगी ?
मैं कवि बन जाऊंगा , क्या तू रचना बन पायेगी ?
ध्रुव तारा बन जाऊंगा मैं काली स्याह रात में ,
वादा कर तू कही अंजान डगर में गुम  हो जाएगी
मैं निकल पडूंगा अनन्त पर पंछी बन के
क्या तू मेरा आसमान बन पायेगी ?
मैं तप लूंगा बाती बन , क्या दीया थाम पायेगी ?
मैं हँसी बन जाऊंगा , क्या अपने होठो पे खिलाएगी ?
मैं काँटा बन जाता हु,  फिर तू गुलाब बन जाएगी ?
रंग गुलाल बन लूंगा मैं , फिर अपने गालो पर सहलाएगी?
मैं काला कज्जल भी बन सकता हु , क्या नैनों में रमायेगी?
मैं छोड़ दूंगा निज जीवन  भी , क्या तू भी कदम मिलाएगी ?

Tuesday, 15 March 2016

हमारी मधुशाला


गर है होश ज़रा तो उठ खड़ा हो
और देख जहा नजरें जाती हो,
हर कोई बैठा है यहाँ पर
लिए हाथ में मे मद प्याला। 
भटको को ये राह दिखाती
राहगीरों को फिर भटकाती,
भला बुरा अब खुद ही समझ ले
ऐसी  है हमारी  "मधुशाला"